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ना कोई दिल में समाया
ना कोई पहलू में आया
जा के भी पास रही तुम ही
ओ जान-ए-जां, जान-ए-मन, जानती हो
क्यो तुमने दामन चुराया, तुम जानो मैं क्या बताऊँ
मुझमे ही कुछ ऐब होगा, क्यो तुम पे तोहमत लगाऊँ
मैं तो यही कहूंगा, पूछोगी, जब भी
तुम जो मुझे दे गई हो, एक खुबसूरत निशानी
लिपटा के सीने से उसको, कट जाएगी जिंदगानी
मैं तो यही कहूंगा, पूछोगी, जब भी | |