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सावरीयाँ, सावरीयाँ, मैं तो हुई बावरीयाँ
तूने मन मोह लिया, सावरीयाँ हो
उलझा सा ये मन हैं, सुलगा सा ये तन हैं
सपनों का सावन हैं, नैनों का आँगन हैं
छलके मन गागरीयाँ, सावरीयाँ हो
जो तू यूँ पास आया हैं, जो तू यूँ दिल पे छाया हैं
तो मैने क्या पाया हैं, कैसे कहूँ
कही धडकन की कलियाँ हैं, कही सपनों की गलियाँ हैं
जो मन में रंगरलियाँ हैं, कैसे कहूँ
तू जो मुझे ऐसे बहकाए
कभी कभी मुझे तो बडी लाज सी आए
भूली हूँ मैं जैसे अपनी डगरीयाँ
जब से हैं देखी मैने प्रेम नगरीयाँ
तू जो मिला मुझे, तो ये सारा समा बदल गया
खिलने लगे फूल से मेरी राह में
फिर यूँ लगा मुझे के ये धरती नई हुई
नया अंबर हुआ तेरी और मेरी चाह में
चंचल हवा तराना कोई गाए
नदीयाँ भी कोई कहानी कहती जाए
जब से मिली सजना तुझ से नजरीयाँ
खो गई हैं सुदबूद की मुझ से गठडीयाँ | |