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रतीया कारी कारी रतीया, रतीया अंधियारी रतिया
रात हमारी तो चाँद की सहेली हैं
कितने दिनों के बाद आई वो अकेली हैं
चुप्पी की बिरहा हैं, झिंगूर का बाजे साथ
रात हमारी तो चाँद की सहेली हैं
कितने दिनों के बाद आई वो अकेली हैं
संझा की बाती भी कोई बुझा दे आज
अंधेरे से जी भर के करनी हैं बाते आज
अँधेरा रुठा हैं, अँधेरा बैठा हैं,गुमसुम सा कोने में बैठा हैं
अंधेरा पागल हैं, कितना घनेरा हैं
चूभता हैं, डसता हैं, फिर भी वो मेरा हैं
उसकी ही गोदी में सर रख के सोना हैं
उसकी ही बाहों में छुप के से रोना हैं
आंखो से काजल बन, बहता अंधेरा आज | |