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धीरे जलना धीरे जलना, जिंदगी के लौ पे जलना
कांच का सपना, गल ही ना जाए, सोच समझ के आंच रखना
होना हैं जो होना हैं वो, होने से तो रुकता नहीं, आसमान तो झुकता नहीं
तेरे रुप की हलकी धूँप में दो ही पल हैं, जीने हैं
तेरी आँख में देख चुका हूँ वो सपने हैं, सीने हैं
आँखों में सपनों की खिरचें हैं, चुभती हैं
सोचा ना था जिंदगी ऐसी फिर से मिलेगी, जीने के लिए
आँखों को प्यास लगेगी अपने ही आँसू पीने के लिए | |