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धीमी धीमी खुशबू हैं तेरा बदन
सुलगे महके पिघले दहके क्यों ना बहके मेरा मन
वो चली हवा के नशा घुला
हैं समा भी जैसे धुँवा धुँवा
तेरा रुप हैं के ये धूप हैं
खुले बाल हैं के हैं बदलियाँ
तू जो पास हैं मुझे प्यास हैं
तेरे जिस्म का एहसास हैं
सांस भी जैसे रुक सी जाती हैं
तू जो पास आये तो आँच आती हैं
दिल की धडकन भी मेरे सीने में लडखडाती हैं
ये तेरा तन बदन कैसी हैं ये अगन
थंडक हैं जिस्म तू वो आग हैं
बलखाती हैं जो तू लहराती हैं जो तू
लगता हैं ये बदन एक राग हैं | |