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लाखों तारे आसमां में, एक मगर ढूँढे ना मिला
देख के दुनिया की दिवाली, दिल मेरा चुपचाप जला
किस्मत का हैं नाम मगर, काम हैं ये दुनिया वालों का
फूँक दिया हैं चमन हमारे ख़्वाबों और खयालों का
जी करता हैं खुद ही घोंट दें, अपने अरमानों का गला
सौ-सौ सदियों से लम्बी ये ग़म की रात नहीं ढलती
इस अंधियारें के आगे अब ऐ दिल एक नहीं चलती
हँसते ही लुट गई चाँदनी, और उठते ही चाँद ढला
मौत हैं बेहतर इस हालत से, नाम हैं जिसका मजबूरी
कौन मुसाफ़िर तय कर पाया, दिल से दिल की ये दूरी
काँटों ही काँटों से गुज़रा, जो राही इस राह चला | |