| हाउस नं. ४४ - House No. 44 (1955)
चूप हैं धरती, चूप हैं चाँद सितारें हेमंत कुमार, साहिर लुधियानवी, सचिनदेव बर्मन
फैली हुयी है, सपनों की बाहें, आजा चल दे कही दूर लता मंगेशकर, साहिर लुधियानवी, सचिनदेव बर्मन
तेरी दुनिया में जीने से तो बेहतर हैं के मर जाए हेमंत कुमार, साहिर लुधियानवी, सचिनदेव बर्मन
| |